मुजफ्फरनगर की डिस्पोजेबल फैक्ट्री में ‘टॉर्चर कैंप’ 20 घंटे काम, सूखी रोटियां और विरोध पर छोड़े जाते थे पिटबुल कुत्ते

संपादक: रजनी शर्म
मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का तितावी थाना क्षेत्र। यहाँ के मंडी गांव में स्थित एक दोना-पत्तल और डिस्पोजेबल कटोरी बनाने वाली फैक्ट्री के बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य नजर आता था, लेकिन इस फैक्ट्री की चारदीवारी के भीतर जुल्म और बर्बरता की जो कहानी लिखी जा रही थी, उसने आधुनिक समाज में बंधुआ मजदूरी के सबसे वीभत्स चेहरे को बेनकाब कर दिया है। पुलिस ने इस फैक्ट्री पर अचानक छापेमारी कर देश के अलग-अलग राज्यों से लाए गए 13 बंधुआ मजदूरों को आजाद कराया है। इन मजदूरों की आपबीती सुनने के बाद खुद पुलिस अधिकारी भी दंग रह गए।
यह पूरी फैक्ट्री किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान की तरह नहीं, बल्कि एक ‘टॉर्चर कैंप’ (यातना गृह) की तरह चलाई जा रही थी। जहाँ उत्तराखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों से आए गरीब मजदूरों को न सिर्फ बंधक बनाकर रखा गया था, बल्कि उनसे रोजाना करीब 20 घंटे बिना वेतन के जबरन काम कराया जाता था।

दीवार फांदकर भागा मजदूर और टूट गया खौफ का साम्राज्य
इस खौफनाक वारदात का पर्दाफाश तब हुआ, जब राजस्थान के जोधपुर का रहने वाला एक मजदूर जान हथेली पर रखकर फैक्ट्री की ऊंची दीवार फांदकर भाग निकला। उसने किसी तरह तितावी थाना पुलिस से संपर्क किया और फैक्ट्री के भीतर चल रहे इस नरक की पूरी दास्तान बयां की। सूचना मिलते ही एसएसपी संजय कुमार वर्मा के निर्देश पर पुलिस टीम ने बिना वक्त गंवाए मंडी गांव स्थित फैक्ट्री पर योजनाबद्ध तरीके से छापेमारी की। पुलिस को देखते ही वहाँ टिनशेड के नीचे नारकीय जीवन जी रहे मजदूरों की आंखों में आंसू आ गए।

फैन बेल्ट, पेचकस और पिटबुल यातनाओं की सारी हदें पार
फैक्ट्री से मुक्त कराए गए मजदूरों के शरीर पर मिले गहरे जख्म और उनके चेहरों का खौफ यह बताने के लिए काफी था कि उनके साथ क्या गुजरा है। नैनीताल के रहने वाले रामू ने कांपती आवाज में बताया हमारे साथ कैदियों से भी बदतर व्यवहार होता था। अगर कोई थकान की वजह से काम रोकता या अपने घर जाने की बात करता, तो मालिक और सुपरवाइजर लोहे की रॉड, पेचकस और फैन बेल्ट से बेरहमी से पीटते थे। इतने से भी मन नहीं भरता, तो हमें डराने और चुप रखने के लिए खूंखार पिटबुल कुत्ते छोड़ दिए जाते थे।
वहीं, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के नारायण ने रुआंसे गले से कहा जब पुलिस ने हमें यहाँ से बाहर निकाला, तो लगा जैसे हमें दूसरी जिंदगी मिल गई हो। हमें तो उम्मीद ही नहीं थी कि कभी सूरज की रोशनी में अपनों से मिल पाएंगे।

पहचान मिटाई, मोबाइल छीने महीनों तक परिवार को पता नहीं था जिंदा हैं या मर गए
जांच में सामने आया है कि इन गरीब मजदूरों को रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों जैसी सार्वजनिक जगहों से नौकरी और अच्छे वेतन का लालच देकर मुजफ्फरनगर लाया गया था। लेकिन फैक्ट्री की दहलीज पार करते ही इनका सब कुछ छीन लिया गया। आरोपियों ने सबसे पहले इनके मोबाइल फोन और आधार कार्ड जैसे पहचान पत्र अपने कब्जे में ले लिए, ताकि ये किसी से संपर्क न कर सकें।
सीतापुर के रहने वाले जगदीश ने बताया कि वह पिछले 11 महीने से इस नरक में कैद था और इस दौरान उसे एक बार भी अपने परिवार से बात करने की इजाजत नहीं दी गई। परिवार के लोग उसे मरा हुआ समझ चुके थे। मजदूरों को रहने के लिए एक दमघोंटू टिनशेड में बंद रखा जाता था, जहाँ से बाहर निकलने की सख्त मनाही थी। खाने के नाम पर उन्हें सिर्फ दो सूखी रोटियां और खराब भोजन दिया जाता था, ताकि वे सिर्फ जिंदा रहकर मशीनें चला सकें।

हत्या का संदेहा गायब मजदूर ‘अर्जुन’ की तलाश में पुलिस
इस मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब मुक्त हुए कुछ मजदूरों ने पुलिस के सामने दावा किया कि नवंबर 2025 में उनके साथ काम करने वाले ‘अर्जुन’ नाम के एक मजदूर ने जब इस प्रताड़ना का कड़ा विरोध किया था, तो उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई और उसके शव को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगा दिया गया। पुलिस ने इस आरोप को बेहद गंभीरता से लिया है। एसएसपी के मुताबिक, पुलिस आसपास के जिलों और राज्यों के लापता लोगों (मिसिंग डायरी) का रिकॉर्ड खंगाल रही है ताकि इस संभावित हत्या के एंगल की कड़ियों को जोड़ा जा सके।
मानसिक आघात और कुपोषण का शिकार हैं मजदूर
सभी मुक्त कराए गए श्रमिकों का मेडिकल परीक्षण कराया गया है। डॉक्टरों की टीम के मुताबिक, लंबे समय तक भूखा रहने और अत्यधिक काम करने के कारण सभी मजदूर गंभीर कुपोषण का शिकार हैं। उनके शरीर पर चोटों के कई पुराने और नए निशान हैं। जिला अस्पताल के डॉक्टर दीपांकर कुमार ने बताया कि शारीरिक चोटों से कहीं ज्यादा गहरा घाव इन मजदूरों के दिमाग पर लगा है। लंबे समय तक कैद और प्रताड़ना के कारण कई मजदूर गहरे मानसिक आघात (ट्रॉमा) और डिप्रेशन के लक्षण दिखा रहे हैं, जिनकी काउंसलिंग की जा रही है।

फैक्ट्री मालिक समेत दो गिरफ्तार, एक फरार
पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी फैक्ट्री मालिक प्रदीप बालियान और सुपरवाइजर शिवा त्यागी को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, मामले का एक अन्य सह-आरोपी अंकित बालियान फिलहाल फरार है, जिसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन टीमें लगातार दबिश दे रही हैं।
पुलिस इस मामले में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम, मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग), अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने (रॉन्गफुल कन्फाइनमेंट), जानलेवा हमला करने और मजदूरी हड़पने जैसी संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में हत्या के सबूत मिलते हैं, तो मुकदमे में हत्या की धाराएं भी जोड़ी जाएंगी और दोषियों को अदालत से सख्त से सख्त सजा दिलाई जाएगी।

