राजनीति

बीजेपी-सपा अभी रणनीति में व्यस्त, बसपा ने उतारे चुनावी योद्धा; पश्चिम यूपी की 15 सीटों पर नाम फाइनल

विशेष ब्यूरो, लखनऊ/मेरठ
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी सरगर्मियां समय से पहले ही चरम पर पहुंच गई हैं। सूबे के बड़े राजनीतिक दल जहां अभी अंदरूनी सर्वे और संगठनात्मक बैठकों के दौर में व्यस्त हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती ने सबको चौंकाते हुए सबसे पहले मैदान में उतरने का बड़ा फैसला किया है। बसपा ने चुनावी तैयारियों में शुरुआती बढ़त लेते हुए पश्चिम उत्तर प्रदेश की करीब 12 से 15 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम फाइनल कर दिए हैं, जिनमें से दो महत्वपूर्ण सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की आधिकारिक घोषणा भी कर दी गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा की इस आक्रामक और त्वरित रणनीति ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसे प्रतिद्वंदियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया है।

हापुड़ और हसनपुर से उम्मीदवारों की घोषणा
मिली जानकारी के अनुसार, बसपा ने पश्चिम यूपी की बेहद संवेदनशील मानी जाने वाली हापुड़ विधानसभा सीट से विपिन दीवान को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। वहीं, अमरोहा की हसनपुर सीट से हाजी मुमताज अली उर्फ हाजी भुट्टू के नाम पर मुहर लगाई गई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 22 जून के बाद से जिलावार बैठकों का दौर शुरू होगा, जिसके बाद बाकी बची सीटों पर भी प्रत्याशियों के नामों की घोषणा सिलसिलेवार ढंग से कर दी जाएगी। जिन अन्य सीटों पर नाम लगभग तय हो चुके हैं, उनमें शिकारपुर, सहारनपुर देहात, पुरकाजी, गढ़मुक्तेश्वर और सरधना जैसी प्रमुख सीटें शामिल हैं।

सोशल इंजीनियरिंग का नया फॉर्मूला
इस बार मायावती का पूरा फोकस ‘दलित + मुस्लिम + सवर्ण’ के पुराने और भरोसेमंद त्रिकोणीय समीकरण को पुनर्जीवित करने पर है। हापुड़ से विपिन दीवान (सवर्ण) और हसनपुर से हाजी मुमताज अली (मुस्लिम) को उतारकर बसपा ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वह पश्चिम यूपी में एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी में है। विशेषकर पश्चिम यूपी में मुस्लिम और दलित मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद को देखते हुए यह दांव बेहद अहम माना जा रहा है।

मंथन में जुटे हैं विरोधी दल
एक तरफ जहां बसपा सीधे उम्मीदवारों के नाम तय कर उन्हें क्षेत्र में सक्रिय होने के निर्देश दे रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा और सपा अभी फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। सत्ताधारी दल भाजपा अपने आंतरिक सर्वे और संगठन की जमीनी रिपोर्ट के आधार पर ही टिकट तय करने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी (सपा) अपने मौजूदा विधायकों की सीटों को सुरक्षित रखते हुए नए चेहरों की तलाश के लिए क्षेत्रीय स्तर पर मंथन कर रही है। सपा नेतृत्व ने कई मौजूदा विधायकों को क्षेत्र में बने रहने और तैयारी जारी रखने के अनौपचारिक संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन आधिकारिक घोषणा से अभी दूरी बनाई हुई है।

मायावती का ‘वापसी मिशन’ और बूथ स्तर की घेराबंदी
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव और हालिया 2024 के लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने के बाद, बसपा सुप्रीमो मायावती इस बार किसी भी तरह की ढिलाई के मूड में नहीं हैं। पार्टी के विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इस बार रणनीति सिर्फ टिकट बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि उम्मीदवारों को साफ हिदायत दी गई है कि वे घोषणा के तुरंत बाद अपने-अपने क्षेत्रों में बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करें। ‘कमर कसने’ की इस आक्रामक नीति से बसपा कार्यकर्ताओं में समय से पहले ही भारी उत्साह देखा जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर पार्टी की खोई हुई जमीन वापस पाने का रास्ता साफ हो सके।

वेस्ट यूपी में ‘दलित-मुस्लिम’ गठजोड़ से बदलेगा समीकरण?
पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही सूबे की सत्ता का रुख तय करती आई है। बसपा द्वारा शुरुआती दौर में ही मुस्लिम और सवर्ण उम्मीदवारों को तरजीह दिए जाने से यह साफ है कि पार्टी विरोधी दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में है। विशेषकर सपा के मजबूत गढ़ माने जाने वाले मुस्लिम बहुल इलाकों में हाजी मुमताज अली जैसे चेहरों को उतारकर बसपा ने सपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यदि यह ‘दलित-मुस्लिम-सवर्ण’ फॉर्मूला जमीन पर सही तरीके से काम कर गया, तो पश्चिम यूपी का चुनावी नतीजा बेहद चौंकाने वाला हो सकता है।

एक नजर में: बसपा का ‘मिशन 2027
सबसे आगे अन्य दलों से पहले उम्मीदवारों के चयन और घोषणा में सक्रियता।

घोषित प्रत्याशी हापुड़ से विपिन दीवान और हसनपुर से हाजी मुमताज अली उर्फ हाजी भुट्टू।

अगला कदम 22 जून के बाद जिलावार प्रत्याशियों की घोषणा की रूपरेखा तैयार।

फोकस सीटें शिकारपुर, सहारनपुर देहात, पुरकाजी, गढ़मुक्तेश्वर और सरधना।
रणनीति भाजपा की संगठनात्मक ताकत और सपा के मौजूदा विधायक कार्ड के मुकाबले ‘समय से पहले उम्मीदवार’ उतारकर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!