जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद PM मोदी पर टिप्पणी मामले में रुचिका सिंह पर Zero FIR दर्ज
जंतर-मंतर बयानबाज़ी मामला: PM मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप में रुचिका सिंह पर Zero FIR दर्ज, जानिए पूरा विवाद

संपादक रजनी शर्म
नई दिल्ली / नोएडा:
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियों और कानूनी विवादों का केंद्र बन गया है। हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा आयोजित किए गए एक प्रदर्शन के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणी ने अब बड़ा कानूनी रूप ले लिया है। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 25 वर्षीय युवती रुचिका सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कर ली है। पूरे मामले की सबसे खास बात यह है कि इस केस में दिल्ली पुलिस के स्थान पर नोएडा पुलिस स्टेशन में ‘जीरो एफआईआर’ (Zero FIR) कायम की गई है, जिसके बाद से ही कानूनी गलियारों और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?

यह पूरा घटनाक्रम बीते 23 जुलाई का बताया जा रहा है, जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले सैकड़ों प्रदर्शनकारी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर जमा हुए थे। इस प्रदर्शन के मुख्य केंद्र में देश की शिक्षा नीति और शिक्षा मंत्री का रुख था। हालांकि, प्रदर्शन के दौरान माहौल तब गरमा गया जब मंच और मीडिया कैमरों के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बेहद तीखी और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में 25 वर्षीय रुचिका सिंह को प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक बातें कहते हुए देखा गया। जैसे ही यह वीडियो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फैला, लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। प्रदर्शन तो बाद में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और सरकार से हुई बातचीत के साथ औपचारिक रूप से समाप्त हो गया, लेकिन इस दौरान कही गई बातें अब कानूनी दांव-पेच का सबब बन चुकी हैं।
नोएडा में दर्ज हुई ‘जीरो एफआईआर’, जानिए शिकायतकर्ता की भूमिका

घटना दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई थी, लेकिन मामले की आधिकारिक शिकायत 29 जुलाई को उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित एक्सप्रेसवे थाने में दर्ज कराई गई। यह शिकायत गाजियाबाद के इंदिरापुरम की रहने वाली वकील स्मृति सिंह ने दर्ज कराई है।
स्मृति सिंह का राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी गहरा नाता है। वह पिछले तीन सालों से कुंडा के प्रमुख नेता रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैया) की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक’ से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। स्मृति सिंह का तर्क है कि देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ सार्वजनिक रूप से इस तरह की अमर्यादित और उकसाने वाली टिप्पणी करना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि इससे समाज में अशांति और भड़काऊ माहौल पैदा होता है।
कानूनी बारीकी (क्या होती है Zero FIR?)
सामान्य तौर पर पुलिस केवल अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में हुई घटनाओं की एफआईआर दर्ज करती है। लेकिन ‘जीरो एफआईआर’ एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसके तहत पीड़िता या शिकायतकर्ता किसी भी थाने में जाकर अपराध की रिपोर्ट दर्ज करा सकता है, चाहे घटना कहीं भी हुई हो। बाद में उस एफआईआर को बिना किसी नंबर के संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने (जहाँ घटना हुई) में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया जाता है। इस मामले में भी नोएडा एक्सप्रेसवे थाने ने जीरो एफआईआर दर्ज कर मामला दिल्ली पुलिस को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की इन धाराओं में फंसा मामला
नोएडा पुलिस ने स्मृति सिंह की तहरीर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की तीन बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण धाराओं के तहत मामला पंजीकृत किया है:
1.धारा 352 (BNS) शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर किसी का अपमान करना (Intentional Insult to provoke breach of peace)।
2.धारा 353 (1) (BNS) सार्वजनिक रूप से उपद्रव, भ्रम या नुकसान पहुंचाने वाली झूठी और भड़काऊ बातें फैलाना।
3.धारा 356 (1) (BNS) मानहानि (Defamation) से संबंधित कड़े प्रावधान।
लिखित शर्त बनाम अभद्र बयानबाज़ी: खड़ा हुआ बड़ा सवाल

इस पूरे विवाद में एक सबसे बड़ा कानूनी और नैतिक पेंच फंस गया है। सीजेपी (CJP) के नेताओं का दावा है कि जब उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ अपना आंदोलन समाप्त किया था, तब सरकार और प्रशासन के साथ एक लिखित सहमति बनी थी। इस शर्त के मुताबिक यह तय हुआ था कि प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले किसी भी आंदोलनकारी या छात्र पर पुलिस कोई कानूनी मुकदमा नहीं चलाएगी और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई होगी।
हालांकि, अब कानूनी विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि क्या इस तरह की ‘सहमति’ संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणी और मानहानि जैसे व्यक्तिगत या आपराधिक मामलों पर भी सुरक्षा कवच प्रदान करती है? पुलिस सूत्रों का कहना है कि आंदोलन की शर्तों का दायरा शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित होता है, न कि किसी पर अमर्यादित हमले या कानून तोड़ने की छूट देने के लिए।
डिजिटल सबूतों की स्क्रूटनी और आगे की जांच
फिलहाल पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि मामले की गहनता से जांच की जा रही है। जांच टीम मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित कर रही है:
डिजिटल साक्ष्यों का परीक्षण: सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो, लाइव स्ट्रीम और न्यूज चैनलों की फुटेज को फोरेंसिक और डिजिटल जांच के लिए भेजा जा रहा है ताकि यह साबित किया जा सके कि वीडियो के साथ कोई छेड़छाड़ या एडिटिंग नहीं की गई है।
गवाहों के बयान: जंतर-मंतर पर घटना के समय मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों, पुलिसकर्मियों और आयोजकों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं।
बयानों की मंशा: यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि क्या यह बयान अनायास दिया गया था या इसके पीछे कोई पूर्व-नियोजित राजनीतिक साजिश या अशांति फैलाने का इरादा था।
आने वाले दिनों में रुचिका सिंह को पूछताछ के लिए समन भेजा जा सकता है। इस कार्रवाई के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष और सहयोगी इसे कानून के दायरे में रहकर की गई स्वाभाविक कार्रवाई मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी और प्रदर्शनकारी संगठन इसे आवाज दबाने की कोशिश करार दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि दिल्ली पुलिस को केस ट्रांसफर होने के बाद इस मामले में क्या नया मोड़ आता है।
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