Bhadohi Name Change: क्या फिर ‘संत रविदास नगर’ होगा भदोही? CM योगी के बयान से सियासी हलचल
भदोही का नाम फिर ‘संत रविदास नगर’होगा? CM योगी के बयान से तेज हुई नाम बदलने की चर्चा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही दौरे के दौरान जिले को एक बार फिर ‘संत रविदास नगर’ के रूप में पहचान दिलाने की बड़ी बात कही है। इसके साथ ही उन्होंने नए संसद भवन में भदोही के कालीन बिछाए जाने का गौरव याद दिलाते हुए 2017 से पहले की कानून-व्यवस्था, माफियाराज और प्रदेश में आ रहे 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया
कालीन नगरी में फिर गूंजा संत रविदास का नाम: क्या बदलने जा रहा है भदोही का आधिकारिक पता?
विश्व पटल पर अपने बेजोड़ हस्तनिर्मित कालीनों के लिए मशहूर भदोही का नाम बदलने की चर्चा एक बार फिर सूबे के सियासी गलियारों में तैरने लगी है। भदोही में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि इस ऐतिहासिक जिले की पहचान अब ‘संत रविदास नगर’ के रूप में होगी। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद स्थानीय स्तर से लेकर राजधानी लखनऊ तक प्रशासनिक और राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
हालांकि, नाम बदलने के इस ऐलान को फिलहाल मुख्यमंत्री के औपचारिक बयान और मंशा के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि किसी भी जिले का नाम आधिकारिक रूप से परिवर्तित करने के लिए राज्य कैबिनेट की मंजूरी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय से अनापत्ति (NOC) मिलने के बाद विधिवत गजट अधिसूचना जारी होना बाकी है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूर्वांचल के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को साधने की एक बड़ी कोशिश मान रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच से उठाया हो। इससे पहले भी वह भदोही को संत रविदास की पावन स्मृति और उनके सामाजिक समरसता के संदेश से जोड़ते हुए जिले को यह पहचान वापस दिलाने की बात कह चुके हैं।
नाम बदलने का पुराना इतिहास और सियासी खींचतान
भदोही के नामकरण का इतिहास उत्तर प्रदेश की राजनीति के उतार-चढ़ाव का गवाह रहा है। साल 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार के दौरान वाराणसी से अलग कर इस नए जिले का गठन किया गया था और इसका नाम महान संत शिरोमणि रविदास के नाम पर ‘संत रविदास नगर’ रखा गया था।
इसके बाद जब 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में आई, तो तत्कालीन सरकार ने कई जिलों के नामों की समीक्षा करते हुए जिले का नाम वापस ‘भदोही’ कर दिया था। उस समय दलील दी गई थी कि अंतरराष्ट्रीय कालीन बाजार में ‘भदोही’ एक स्थापित ब्रांड है, इसलिए मूल नाम को बरकरार रखा जाना चाहिए। अब एक दशक से ज्यादा समय बाद सीएम योगी द्वारा इसे दोबारा ‘संत रविदास नगर’ के नाम से पुकारे जाने और पहचान देने की घोषणा ने पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। स्थानीय लोगों और बुनकरों के बीच भी इस बात को लेकर मिला-जुला कौतूहल है कि प्रशासनिक कागजों में यह बदलाव किस रूप में दर्ज होगा।
संसद की दहलीज तक पहुंची भदोही की कालीन: हुनरमंद हाथों का सम्मान
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने जिले के सबसे मजबूत आर्थिक स्तंभ—कालीन उद्योग—का प्रमुखता से जिक्र किया। उन्होंने देश के नए संसद भवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जब लोकतंत्र के नए मंदिर का उद्घाटन हुआ, तो उसकी फर्श पर भदोही के हुनरमंद कारीगरों के हाथों से तैयार कालीन बिछाए गए थे। यह पूरे उत्तर प्रदेश और खासकर भदोही के बुनकरों के लिए ऐतिहासिक गौरव का क्षण था।
मुख्यमंत्री ने कालीन उद्योग के पुराने दिनों का दर्द बयां करते हुए कहा कि एक समय था जब यहाँ के कारीगर और निर्यातक बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते थे। उन्होंने कहा:
बिजली और बुनियादी ढांचा: 2017 से पहले बिजली की भारी किल्लत, टूटी-फूटी सड़कें और सरकारी प्रोत्साहन की कमी के कारण कालीन उद्योग मंदी और पलायन की मार झेल रहा था।
तकनीक और बाजार की दूरी: परंपरागत शिल्पकारों को न तो आधुनिक तकनीक से जोड़ा जा रहा था और न ही अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों के लिए कोई ठोस सरकारी संरक्षण मिलता था।
सुरक्षा का अभाव: कच्चे माल की आवाजाही से लेकर तैयार माल के परिवहन तक हर कदम पर व्यापारियों को भय और असुरक्षा के माहौल से जूझना पड़ता था।
सीएम ने दावा किया कि बीते वर्षों में सरकार ने ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) और क्लस्टर योजनाओं के जरिए स्थानीय हस्तशिल्पियों को तकनीक, ऋण और अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने का काम किया है, जिससे कालीन नगरी की चमक वैश्विक पटल पर फिर से लौट रही है।
2017 से पहले दंगे, कर्फ्यू और गुंडागर्दी थी पहचान”: कानून-व्यवस्था पर तीखा प्रहार
मंच से सीएम योगी ने पूर्ववर्ती सरकारों पर जमकर निशाना साधा और 2017 से पहले के उत्तर प्रदेश की तुलना आज के माहौल से की। उन्होंने कहा कि आठ-नौ साल पहले प्रदेश की पहचान दंगों, बार-बार लगने वाले कर्फ्यू, माफियाराज और खुलेआम होने वाली गुंडागर्दी से होती थी। विकास की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित थीं और आम नागरिक भय के साए में जीने को मजबूर था।
मुख्यमंत्री ने कहा, “अब उत्तर प्रदेश में वो दौर बीत चुका है जब माफिया और अपराधी खुलेआम असलहे लहराकर व्यापारियों और आम जनता को धमकाया करते थे। आज कानून का राज है। कोई भी अपराधी व्यापारी की संपत्ति पर कब्जा करने या किसी बेटी की सुरक्षा में सेंध लगाने की जुर्रत नहीं कर सकता।”
उन्होंने कानून-व्यवस्था को आर्थिक तरक्की की पहली शर्त बताते हुए कहा कि सुरक्षित माहौल बनने की वजह से ही आज निवेशक बिना किसी झिझक के उत्तर प्रदेश का रुख कर रहे हैं।
50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव: बदलती अर्थव्यवस्था का नया खाका
कानून-व्यवस्था में सुधार को उद्योग जगत के भरोसे से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री ने निवेश के बड़े आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश को अब तक 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं, जो देश के किसी भी राज्य के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि है।
मुख्यमंत्री ने इन निवेश प्रस्तावों की प्रगति का ब्योरा देते हुए बताया:
1- 15 लाख करोड़ की परियोजनाएं धरातल पर: प्राप्त प्रस्तावों में से करीब 15 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स का ग्राउंडब्रेकिंग सेरेमनी (शिलान्यास) पूरा हो चुका है और कई परियोजनाओं पर निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
2- 7.5 लाख करोड़ की अगली तैयारी: उन्होंने ऐलान किया कि जल्द ही लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये की नई औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अगला ग्राउंडब्रेकिंग समारोह आयोजित किया जाएगा।
3- स्थानीय स्तर पर रोजगार: इन भारी-भरकम निवेशों से केवल बड़े शहरों को ही नहीं, बल्कि भदोही, मिर्जापुर और सोनभद्र जैसे छोटे औद्योगिक और विनिर्माण केंद्रों में भी लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
जमीनी नब्ज: विकास, विरासत और पहचान का संतुलन
मुख्यमंत्री के इस पूरे भाषण से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सत्ताधारी दल पूर्वांचल में विकास के आर्थिक एजेंडे के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान की राजनीति को पूरी धार दे रहा है। एक तरफ जहां 50 लाख करोड़ के निवेश, संसद भवन तक कालीन पहुंचाने और माफियामुक्त शासन का जिक्र कर ‘सुशासन’ का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भदोही को ‘संत रविदास नगर’ की पहचान दिलाने की बात कहकर समाज के वंचित और मेहनतकश तबके को सीधा सम्मान देने का संदेश दिया गया है।
अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री की इस घोषणा को प्रशासनिक स्तर पर कब अमलीजामा पहनाया जाता है और इसका आधिकारिक राजपत्र कब जारी होता है। लेकिन इतना तय है कि कालीन नगरी की फिजाओं में विकास, विरासत और नामकरण की यह नई बहस आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है।
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